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बन जाओ







बन जाओ
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क्यू बस  समझने समझाने पर जाओ
अपना सोचा खुद कर भी अब  जाओ 
 बात अपनी क्या उन से  कहलवाओ
 ख़ुदग़र्ज़ हो हाल -ए -दिल क्या बताओ 
,मुस्कुरा कर सह ले गम तू ज़िन्दगी के
क्यू अपने गम से उसे रोज़  कहीं रुलाओ 
दिये सा मंदिर में जल रौशनी भी फैलाओ
प्यार को दिल में यू अपने तुम बसा जाओ
किसी के लिए जी कर खुशियाँ ही  बरसाओ
प्रेम पूजा है गली में बदनाम क्यू कर जाओ
किसी को "अरु" प्रेम  दान कृष्ण बन दे जाओ 

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"