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याद आई







आज ना जाने क्यू मुंशी प्रेम चंद कि ईदगाह याद आई
हमीद तेरे चिमटे मांगी हो कोई दुआ कही याद हो आई
माँ तेरे प्यार से भीगा मेरा ही आँचल ये ही सदा बस आई
कैसा भी रहा हो  मैला आँचल  बस  बात इतनी समझ आई
नारी तेरा जीवन कैसा भी हो जब तुझ में कहीं माँ नज़र आई
तू मुझे बस यशोदा , कौसल्या ,अनुसूइया , अंजनी नज़र आई
कालकोठरी में देवकी सी , माताजगत जननी ही तू ही कहलाई
रंभा , हो या मेनका , ऊर्वशी भी तो  कहीं जा कर माँ ही कहलाई
आराधना राय

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में लग गई आग सारे जमाने में लगेगी सदिया रूठो को मानने में अजब सी बात है ये दिल के फसाने में उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में आराधना राय 

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"