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जीवन कि धुरी होती है

जीवन कि धुरी होती है
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माँ का दिल होता नहीं औरो सा
दिल के ज़ख्मों को सी लेती है
अश्क़ चुपके से भी पी लेती है
बात कैसी भी हो वो सह लेती है
माँ मर कर भी जी कैसे लेती है
मेरे गुनाहों को माफ़ कर देती है
प्यार कि चादर से ढक वो देती है
किसी बात का गिला नहीं उसको
जो मांगा नहीं वो भी तो दे देती है
 खुदा हो कर भी खुदा कहा होती है
 कभी धरती कभी सागर हो लेती है
माँ जितना भी कहु कम है तेरे लिए
 कभी हारी ना जीती जीवन के लिए
माँ तू यू भी कैसे ऐसे ही ज़ी लेती है
 दूर हो तो जीवन ही दूर सा लगता है
माँ तू ही  इस जीवन कि धुरी होती है
आराधना राय

याद आई
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आज ना जाने क्यू मुंशी प्रेम चंद कि ईदगाह याद आई
हमीद तेरे चिमटे मांगी हो कोई दुआ कही याद हो आई
माँ तेरे प्यार से भीगा मेरा ही आँचल ये ही सदा बस आई
कैसा भी रहा हो  मैला आँचल  बस  बात इतनी समझ आई
नारी तेरा जीवन कैसा भी हो जब तुझ में कहीं माँ नज़र आई
तू मुझे बस यशोदा , कौसल्या ,अनुसूइया , अंजनी नज़र आई
कालकोठरी में देवकी सी , माताजगत जननी ही तू ही कहलाई

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श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"