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ज़न्नत




साभार गुगल इमेज़


वफ़ा पे ज़फ़ा का इल्ज़ाम आया
वो खुश रहे सदा ये पैगाम आया

ये तकदीर उनकी खुदा ले आया
ज़न्नत में कैसी शमा लेकर आया

हसी तेरी मंज़िल हसी मेरी महफिल
ज़माने को ये नहीं अब ये रास आया
  
ख्वाबों के नशे मन हमें ही साथ लाये
मेरे दिल में उजालों कि बारात ले आये 
कॉपीराइट @ आराधना राय


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आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))