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बचपन






  बचपन


  कभी  बेवज़ह , रूठना   और     मनना,
  बिना बात के वो  पहरो   खिलखिलाना

  कही देर तक गुम हो,  गुप चुप यू खेलना
 दोपहर  गर्मियों  की इस तरह से बिताना 
 वो हाथो से  तितली,  पकड़ने की   बाते 
 और  बातो ही बातो में  दिन  का  गुज़रना

 वो पीठु का गिरना , वो गिली का ढूढ़ना
  वो  कंचो का पीटना , स्तापु का टूट जाना

 हर एक बात में चीख चिल्लाहट करना
वो खुश हो कर , जीत का जश्न मानना

  वो झूले पे  झूलने की  हसीं , जवां  बाते
  वो आसमा को  पींगे  बढ़ाके छु  लेना


 वो बचपन के दिन थे और ख्वाबो  की राते
 जैसे हो शबनम के मोती बिखेरने की बाते


copyright : Rai Aradhana ©
अना * \आराधना

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"