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तस्वीर मिटा देना

                                     
                              ग़ज़ल
               


पास  जो रखी है वो तस्वीर तुम छिपा  देना
अपने ख्वाबों की तावीर खुद ही मिटा लेना

ग़र्क़ चुपचाप ज़र्रे -ज़र्रे  आँसु  को  कर  देना
अपने  निशां खुद से ही यू तुम मिटा  लेना

सब के इल्ज़ाम  सर खुद कुछ यू उठा लेना
आग दामन में तुम अपने ही खुद लगा लेना

कोई दर ख्वाब का देखा ही नहीं कभी तुमने
हर रोज़ अपने को यू ही तुम बस बहला लेना

कोई उम्मीद खुद से ही ना तुम  बढ़ा लेना
बेवफ़ा को फिर कहीं बा-वफ़ा ना बना देना

वादे तो वादे हैं बस क्या उन पे भरोसा करना
चाक खुद अपना ज़िगर ना तुम कहीं कर लेना

उन के पहलू में क्यू ज़ार-ज़ार हम रोए "अरू  "
हम ने सीखा ही नहीं  उन  से  किनारा कर लेना


copyright : Rai Aradhana ©

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))