Skip to main content

Posts

اعتراف - Itiraf एतरफ (Confession )

               साभार    गूगल   इमेज                                            नज़्म   एतरफ  اعتراف  Confession   दिली एहतमाद है मुझे तुझसे जो है  एक दूसरे का बस  एहतराम ,नहीं है दिल ने दिल से कहीं, वो बात नहीं है  तन्हाइयों के नाम मेरा पैगाम यही है रुसवाईयाँ,शिक़वे गिले सब नज़र में है  पर तुझ को छोड़ कर मंज़िल ही नहीं है  मेरी दुनिया तेरी उम्मीदों से यूँ परे ही है   वादे है ,हसींन मगर फ़रेब की तरह ही है   ये दुनियाँ सरकश सी सराब की तरह यूँ है   दिखता है क्या न पूछिये  बाजार ही तो है  मायूस हूँ ,खुद से मगर ना उम्मीद नहीं हुँ  ये हौसला इस जद्दोजहद में बाकी है दोस्त   , टूटेगा तेरा , इस्रार इक रोज़ तो मेरे ही आगे, झुकता है कभी आसमां ज़मी के  कही आगे   इस , ताबो , तपिश की भी ना  तासीर रहेगी , ...

जन्म अन्तिम भाग

 जन्म  शालिनी नाम का डर , उस की ज़िन्दगी से निकल चूका था वो अपने आप को ये कब का समझा चूका था ,बस एक चुभन थी , जो किसी चीज़ को न पा कर होती है। दूर से बैसे भी हर लड़की शालिनी जैसी ही लगती ,पर उस हादसे में वो बची भी होगी तो कैसी ? गगन की हंसी उसे अब भी सुनाई पड़ रही थी ,.   अगले दिन शिशिर छुट्टी के मूड़  में उठा , रात  की बात  और अपनी सोच पर उसे हँसी  आ  रही थी । रोज़ी , लता ,चारु ,कविता औरो के तो नाम भी याद नहीं  कितनी आई और जाएगी , आज नलिनी  से मिलने  का टाइम फिक्स है फिर और बातो के लिए उस के पास टाईम  नहीं, 35 कोई उम है शादी कर ने की ।  अभी भी उसे लोग 25 का समझते है , फिर शादी करके एक के साथ बंधे रहो , अनिरुद्ध नहीं हुँ भाईसाब जैसा , ऑफिस में  लड़किया खुसपुसती है सर की शादी हो गई ..  अपनी एक कलम के वार से किसी की भी  रिपोर्ट  अच्छी.....................  या  ख़राब   कर सकता था। अनिरुद्ध ने एक  दिन कहा था। ..   'तेरी भी शादी हो गई होती तो , ...

जन्म (भाग -2 )

अपनी सोच  में ध्यान  ही नहीं रहा की चाय हो गई है , आराम से बैठ  कर  चाय पियूँगा और कल छुट्टी का फायदा उठा कर नलिनी से मिलूंगा ,वह  मन ही मन कार्यक्रम बना रहा था ।  "सिळि गर्ल, सोचती है मैं उस के प्यार मे हुँ । प्यार तो मैंने शलिनी को  भी नहीं किया था , वक़्ती ख़ुमार था उतर गया "।  ये क्या, मैं फिर से........ उसने अपना सर झटका जैसे सर के झटकने से उसकी सोच भी दिमाग से चली जाएगी । उफ़ , उस के मुँह से निकला , वह अब बेचैन हो उठा । चाय का प्याला एक तरफ रख कर वह कमरे में  चहल- कदमी करने लगा ।  ........................क्रमश। …। अब आगे    गतांक से आगे -------------------------------                                 जन्म (भाग -2 ) पंद्रह सालो में ज़माना बदल गया , लोग बदल गए पर उसका डर नहीं  बदला । हालांकि जब उसे सब से  ज़्यादा नुक़सान जब हो सकता था ,तब  वो बचा लिया गया , शहर कोई भी हो सिक्को  की खनक हर जगह काम  आती है...

जन्म

जन्म  कहते है दुनिया बहुत छोटी है ,पर फ़िर भी बिछड़े हुए, जब नहीं मिल  पाते ,तब हम अपनी तकदीर को कोसते है । छोटी लगने वाली दुनिया  अचानक  बड़ी सी लगती है. पर शिशिर जिसे पन्द्रह (15 ) सालों से तलाश  रहा था , उसके अचानक मिलने से वो सकपका क्यों गया ?  ग्लानि , खेद  ,क्षोभ से भर उठा ।  ना चाह कर भी, वही बाते उसके दिमाग मे शोर सा  मचा रही थी,   जिन्हें वो भूल जाना चाहता था ।  कई बार जिन्हें ढूढ़ने के  लिए हम बेताब रहते हैं,  जो हमारी ज़िन्दगी की  तरह होते है,एक न एक  दिन ना मिल पाने की ना उम्मीदी  और वक़्त के  साथ आई दूरियों में कही   उनकी यादें धूमिल हो जाती है ,पर अचानक जो हुआ उस के लिए शिशिर  तैयार नहीं था ?  जो उसे दिखाई दिया , उस से वह कभी भी मिलना नहीं चाहता था , उसे हर शहर -शहर इस लिए नहीं ढूढा  की वो उस से प्यार करता था बल्कि वह  कुछ सुनिचित करना चाहता था, वो सच जो  आज  उसका डर बन गया था ।  वो समझ ही नहीं पा रहा...