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वो

दुखों  कि  गठरी  बांध  कर
वो  मेरे  घर  आता  है
हँसता  है  मुस्कुराता  है
अपनी  नम  आँखे  लिए
वापस  लौट  जाता  है

कैसे  कहे  वो  दर्द  सीने  के
अपना  हर  रिश्ता  आज़माता  है

किसे  दर्द  कह दे  किसी  के  नाम
लिख  दे
वह अपने  रंज  पर  बस ठहाके  लगता  है

खामोश हो  सब  सह  लेगा  या दर्द
का दरिया  बन  जायेगा

एक  ना  एक  दिन  वो  समंदर  सा
अपना सब  दर्द  सह  जायेगा
आराधना



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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला