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नज्म

   
नज्म
इश्क़ कि बाते सभी करते है क्या जाने 
 दिल अपना के रखते है क्या वो क्या जाने

इश्क़ का जादू है मिराज़ है धोका क्या जाने
मर कर जीते  है रस्म ए अदायगी क्या जाने

आग सीने में लगी है दिल का तमाशा क्या जाने 
दो बूंद थे दिल के छलक गए वफा के नाम क्या जाने

वो खाक उड़ाते है, रास्तों पर क्यू  कहाँ क्या जाने
हम उनको दुआ देते है,रह रह कर अरु क्या जाने

नज्म आराधना राय अरु
नज्म में भार तोल माप होता है पर रदीफ और काफिया नहीं
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है
देख कर आए है दुनियाँ सारी
ना वो दर रहा ना वो घर रहा
आँधियों  का डर नहीं था धरोंदे को
मेरा दिल ही हादसों के नज़र रहा
तोड़ दी कमर मेरी गरीबी ने
मै जहां रहा  बे शज़र रहा
आ गए याद मुझे चहरे पुराने
उन्ही के नगर बे डगर रहा
अरु