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ज़माने बदल गए



साभार गुगल

मेरे तेरे अब वो ज़माने बदल गए
लोगों के आजकल फसाने बदल गए
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बदहालियों के जुर्म से कैसे निकल गए
रोजी की दौड़ में कितने तराने बदल गए
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आँखों में जाने कितने शरारे मचल गए
ए- आसमां तेरे सारे नज़ारे बदल गए
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ज़मघट लगा कर लोग कितने निकल गए
मिलने मिलाने में कितने ज़माने बदल गए
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रोशनी को देख कर परवाने जल गए
उम्मीद के गाँव से दीवाने बदल गए
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फाका परस्ती में जितने दिन निकल गए
वक़्त के धारे में कितने चेहरे बदल गए
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आसमां के नाम पर "अरु" सितारे बदल गए
गुम चाँदनी हो गई झिलमिल नजारे बदल गए
आराधना राय "अरु"
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला