Skip to main content

आतंक




मन ये आतंक का शिकार व्यर्थ सा क्यों अब हो कहीं खो गया
निष्फल हो रही देव साधना और मानव कहीं तिरोहित हो गया

मन  बेचैनी का दर्पण सुख पे रीझा दुःख में कुम्हलाया रीत गया
जाने कौन सी स्मृति का विस्मित सा यू ही अब तो  हरण हो गया

जग बैरी था उसमें जीना व्यवधान सा  दुष्कर यू प्रतीत ही हो गया
उन्मुक्त ह्दय भी बेड़ियों के अधीन क्यों अब व्यथित सा हो गया

भावनाओं के साथ खेलता ये संसार था जीवन जीना यू प्रश्न हो गया
"अरु" साँकल चढ़ा लो दरवाज़ों पे यहाँ अब आतंक का व्यापार हो गया
आराधना राय



Post a Comment

Popular posts from this blog

कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय