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शेष




शेष रही केवल आशाये  
जो बनी कोमल भावनाए
पँख ,पखेरू उड -उड़ जाये
 साजन तुम क्यों नहीं आये
वर्षा जल जब मेघ गिराये
सब रस उर में ही बस जाये

मधुर भावनाओं का परिहास
वहाँ रहा  तेरा और मेरा  हास्
जब मन की  पहचान नहीं थी
बोलो अब किन नयनं कि आस
सदा ना होती जग में  पूरी प्यास
 जब प्राणों को प्राणों कि हो  आस

रूप, रंग के इस नव यौवन पर ही  
क्या यू ही चलेगा तेरा अभिसार
और जगत के बढे बंधन पर भी
चल पाया क्या ये सब कार्य व्यापार

 आराधना
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला