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बचपन






  बचपन


  कभी  बेवज़ह , रूठना   और     मनना,
  बिना बात के वो  पहरो   खिलखिलाना

  कही देर तक गुम हो,  गुप चुप यू खेलना
 दोपहर  गर्मियों  की इस तरह से बिताना 
 वो हाथो से  तितली,  पकड़ने की   बाते 
 और  बातो ही बातो में  दिन  का  गुज़रना

 वो पीठु का गिरना , वो गिली का ढूढ़ना
  वो  कंचो का पीटना , स्तापु का टूट जाना

 हर एक बात में चीख चिल्लाहट करना
वो खुश हो कर , जीत का जश्न मानना

  वो झूले पे  झूलने की  हसीं , जवां  बाते
  वो आसमा को  पींगे  बढ़ाके छु  लेना


 वो बचपन के दिन थे और ख्वाबो  की राते
 जैसे हो शबनम के मोती बिखेरने की बाते


copyright : Rai Aradhana ©
अना * \आराधना
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




नज्म

नज्म
हाल उनको भी पता है जमाने का नही यह काम उनको कुछ बताने का
खुद ही तोड़ दी अपनी हमने अना यह खेल नहीं सनम उनको मनाने का
कभी तो लब पे मेरा नाम लेते वो हमें काम नहीं कुछ उन को जताने का
मेरे इकरार पर उनका इसरार होगा जब तभी तो बात बनेगी रिश्ता निभाने का
आराधना राय

नज्म

उम्र भर के निशा ढूंढते है
ऐ - सहर हम तुझे ढूंढते है तू सितारा है आसमा का 
दर -ब -डर हम तुझे ढूंढते है तू है सागर में भी हु नदिया
तेरे कदमो में पनाह ढूंढते है राते कितनी भी हो गई काली
एक उजाले को हम ढूंढते है ---------------अरु